શુક્રવાર, 27 જુલાઈ, 2012
સોમવાર, 16 જુલાઈ, 2012
ગઝલ : વ્યથાઓ બધી લયસભર પણ ઉકેલી.
વરસતી રહી તરબતર પણ ઉકેલી.
વ્યથાઓ બધી લયસભર પણ ઉકેલી.
ફૂટી ડાળને કૂંપળો કૈં વસંતે!
ઉકેલી અમે પાખર પણ ઉકેલી.
નથી કોઇ શબ્દો, નથી એક અક્ષર,
મળે મૌન કાગળ ખબર પણ ઉકેલી.
મૂકાયા હશે કૈંક ટહુકાં પ્રણયના,
મળી જાય તું દેખ ઘર પણ ઉકેલી.
ફરી આપણે એકલાં ભરબજારે!
રહી એક બાકી કસર પણ ઉકેલી.
મૌલિક શ્રોત્રિય
રવિવાર, 15 જુલાઈ, 2012
ग़ज़ल: दरिया दरिया–सा लगता है।
अपने ही घर के आँगन में तनहा तनहा–सा लगता है।
आईना क्यूँ मुझको इतना बदला बदला–सा लगता है?
गुजरी दास्तानो से यारो क्या हाँसिल कर पाओगे?
दिन भी गुजरे, रातें गुजरी सपना सपना–सा लगता है।
खुद से बीछड़ जाने का ग़म मुझ से ज्यादा किस को होगा?
हसता गाता शहर अब तो ठहरा ठहरा–सा लगता है।
फैल गया है खुश्बू जैसा तेरे होने का अहेसास,
कहीं भी हो फिर भी मुझ को महका महका–सा लगता है।
बारीशों के इस मौसम में कैसे भीगा पूछो यारो?
अब के सावन इतना बरसा दरिया दरिया–सा लगता है।
મંગળવાર, 10 જુલાઈ, 2012
ग़ज़ल: दरिया दरिया–सा लगता है।
ग़ज़ल: दरिया दरिया–सा लगता है।
अपने ही घर के आँगन में तनहा तनहा–सा लगता है।
आईना क्यूँ मुझको इतना बदला बदला–सा लगता है?
गुजरी दास्तानो से यारो क्या हाँसिल कर पाओगे?
दिन भी गुजरे, रातें गुजरी सपना सपना–सा लगता है।
खुद से बीछड़ जाने का ग़म मुझ से ज्यादा किस को होगा?
हसता गाता शहर अब तो ठहरा ठहरा–सा लगता है।
फैल गया है खुश्बू जैसा तेरे होने का अहेसास,
कहीं भी हो फिर भी मुझ को महका महका–सा लगता है।
बारीशों के इस मौसम में कैसे भीगा पूछो यारो?
अब के सावन इतना बरसा दरिया दरिया–सा लगता है।
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