શુક્રવાર, 23 નવેમ્બર, 2012

ग़ज़ल

ग़ज़ल 

बिछड़ के तुम से मै जिन्दा हूँ एतबार ना कर।
जमाना कुछ भी कहता है चलता फिरता पा कर।

आईने में मुझको अब कोई ओर  नजर आता है,
जब तक मेरे पास रहा मेरी परछाई बनकर।

कोई बच्चा पुकारे तो मैं भी तन जाता हूँ,
सिहर जाता हूँ कुछ देर बेबस आँखे छिपा कर।

उसको सोचा करता जब भी पाता खुद को तनहा,
मुझको चौका देगा वो मेरे पीछे से आ कर।

क्या लिख पाता अब मैं भर आता हूँ दिल ही दिल में,
बैठा रहता घंटो तक अपनी आँखे झुकाकर।
- मौलिक श्रोत्रिय 

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