ग़ज़ल
बिछड़ के तुम से मै जिन्दा हूँ एतबार ना कर।
जमाना कुछ भी कहता है चलता फिरता पा कर।
आईने में मुझको अब कोई ओर नजर आता है,
जब तक मेरे पास रहा मेरी परछाई बनकर।
कोई बच्चा पुकारे तो मैं भी तन जाता हूँ,
सिहर जाता हूँ कुछ देर बेबस आँखे छिपा कर।
उसको सोचा करता जब भी पाता खुद को तनहा,
मुझको चौका देगा वो मेरे पीछे से आ कर।
क्या लिख पाता अब मैं भर आता हूँ दिल ही दिल में,
बैठा रहता घंटो तक अपनी आँखे झुकाकर।
- मौलिक श्रोत्रिय
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