શુક્રવાર, 23 નવેમ્બર, 2012

ग़जल

ग़जल 

बेबस आज गम की बौछार धीरे धीरे।
थम गई जिंदगी की रफ़्तार धीरे धीरे। 

इतना तूट चूका हूँ यूँ बिखर जाऊंगा,
कि हवाओ गुजरना इसबार धीरे धीरे।

मैं नहीं चाहता कोई इस कदर पहचाने,
याद करना मगर मेरे यार धीरे धीरे।

यूँ गुजरती रहेगी शामो सहर मेरी भी,
सिर्फ लम्हे चुरालूं दो चार धीरे धीरे।

माफ़ करता रहा हूँ करता रहूँगा सब को,
एक गलती मुझे बक्ष दो यार धीरे धीरे।

ख्वाब देखे गए हैं मेरी निगाहों से भी,
चाहिए गर तुझे जा उस पार धीरे धीरे।
-मौलिक श्रोत्रिय  


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