સોમવાર, 8 ડિસેમ્બર, 2014

उम्मिदें जमाने से आज छोड़कर रख दी. बंदिशें सभी आईने ने तोड़कर रख दी. मैं उदासियों से भी फ़सला रखुं लेकिन, जिंदगी यही कोशिश में निचोड़कर रख दी. रोज मैं निकलता हूँ ख्वाहिशें उठाकर यूँ, थी करीब मंजिल तो राह मोड़कर रख दी. वक़्त साथ देता ना ही ज़मीर किस्मत से, मिल ही गई थी पर हाथ जोड़कर रख दी. क्या करे शिकायत हो बात जब मुकद्दर की, बेवजह ही अपनी गर्दन मरोड़कर रख दी. -मौलिक श्रोत्रिय

Gazal

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