ग़ज़ल: दरिया दरिया–सा लगता है।
अपने ही घर के आँगन में तनहा तनहा–सा लगता है।
आईना क्यूँ मुझको इतना बदला बदला–सा लगता है?
गुजरी दास्तानो से यारो क्या हाँसिल कर पाओगे?
दिन भी गुजरे, रातें गुजरी सपना सपना–सा लगता है।
खुद से बीछड़ जाने का ग़म मुझ से ज्यादा किस को होगा?
हसता गाता शहर अब तो ठहरा ठहरा–सा लगता है।
फैल गया है खुश्बू जैसा तेरे होने का अहेसास,
कहीं भी हो फिर भी मुझ को महका महका–सा लगता है।
बारीशों के इस मौसम में कैसे भीगा पूछो यारो?
अब के सावन इतना बरसा दरिया दरिया–सा लगता है।
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