ग़ज़ल:
ये नफ़रतो के पेड बोना अच्छा नहीं होता।
छत से परिंदों को उड़ाना अच्छा नहीं होता।
मैं इन फ़रिश्तों को बना दूँगा आदमी जैसे,
यूँ इस तरह से आज़माना अच्छा नहीं होता।
अब चैन की नींदें कहाँ आती हैं, बता मुझ को?
सोते हुए को यूँ जगाना अच्छा नहीं होता।
बच्चे कभी बच्चे नहीं रहते जानते हो फ़िर?
बस दोसती कर लो, सताना अच्छा नहीं होता।
फाँसी लगा कर देख लो या दे दो ज़हर मुझ को,
सारे सितम कर ले, मिटाना अच्छा नहीं होता।
तुझ को पता है ये हकीकत, इंसान हूँ आखिर,
दर दर भटकना, सर झुकाना अच्छा नहीं होता।
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